Kahani Sangrah-Real Story Total Real Story - 8
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अमरीका की धावक गेल डेवर्स

इंसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता.

अगर इंसान चाहे तो वह पहाड़ को भी हिला कर दिखा सकता है

मंद बुद्धि से महानता तक.

इंसानी जज़बे की सच्ची कहानी

Ghanshyam Das Birla (April 10, 1894 – June 11, 1983)

जिलेट

Ghanshyam Das Birla (April 10, 1894 – June 11, 1983)
 
 

भारत  के प्रख्यात उधोगपति घनश्याम दास बिड़ला ने अपने बिजनेस कैरियर की शरुआत शुन्य से एक जूट ब्रोकर के रूप में की थी | वे अपने भाई के साथ एक कमरे के माकन में रहते थे | उसी कमरे में वे सोते, खाना बनाते और कपड़े धोते थे | बिड़ला पांचवीं क्लास से आगे नहीं पढ़े थे, परन्तु उनके मन में आग और सफल उधोगपति बनने का जज्बा था |
उस ज़माने में जूट के ब्यवसाय में अंग्रेजो का एकाधिकार था और बिड़ला इस एकाधिकार को तोडना चाहते थे | इस प्रयास में बिड़ला को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा | जूट का ब्यवसाय करने के लिये उन्हें बैंकों ने लोन देने से इनकार कर दिया | यही नहीं, अच्छी जमीन खरीदने की राह में भी अंग्रेजों ने रोड़े अटकाये,क्योंकि अंग्रेज नहीं चाहते थे की जूट के ब्यवसाय में कोई हिंदुस्तानी उनका प्रतिद्वंदी बने | बहरहाल,बिड़ला साड़ी मुसीबतों से जूझते हुए अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते रहे | जूट का बिजनेस शुरू करने के बाद उन्होंने बहुत सी कंपनियाँ स्थापित कींबिड़ला इतनी आगे की सोचते थे की जब वे कोई नई मशीन बाहर से मंगवाते थे, तो उसके स्पेयर पार्ट्स भी साथ ही मंगवाते थे, ताकि कभी भी मशीन ख़राब होने पर काम नरुके | इसी दूर दृष्टि सोच की वजह से उनकी मृत्यु के समय बिड़ला ग्रुप में २०० कम्पनियाँ थीं, जिनके पास ,५०० करोड़ से अधिक की सम्पति थी |

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Posted on :8/8/2015 3:06:27 PM
   
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