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सपने कौन नहीं देखता ?

अगर मेंढक को गर्मा गर्म उबलते पानी में डाल दें तो

ज़िन्दगी खुद को खोजने के बारे में नहीं है. ज़िन्दगी खुद को बनाने के बारे में है.

सफलता विना बाधाओं के नहीं मिलती

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क्योंकि हर सफलता कई असफलताओं के बाद ही मिलती है...

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अगर मेंढक को गर्मा गर्म उबलते पानी में डाल दें तो
 
 

अगर मेंढक को गर्मा गर्म उबलते पानी में डाल दें तो वोछलांग लगा कर बाहर आ जाएगा और उसी मेंढक को अगर सामान्य तापमान पर पानी से भरेबर्तन में रख दें और पानी धीरे धीरे गरम करने लगें तो क्या होगा ?*

 

*मेंढक फौरन मर जाएगा ?*

*जी नहीं...*.

 

*ऐसा बहुत देर केबाद होगा...*

*दरअसल होता ये हैकि जैसे जैसे पानी का तापमान बढता है, मेढक उस तापमान के हिसाब से अपने शरीर को Adjust करने लगता है।*

 

        *पानी का तापमान, खौलने लायक पहुंचने तक, वो ऐसा ही करता रहता है।अपनी पूरी उर्जा वो पानी के तापमानसे तालमेल बनाने में खर्च करता रहता है।लेकिन जब पानी खौलने को होता है और वो अपनेBoiling Point तक पहुंच जाता है, तब मेढक अपने शरीर को उसके अनुसार समायोजित नहीं कर पाता है, और अब वो पानी से बाहर आने के लिए, छलांग लगाने की कोशिश करता है।*

 

          *लेकिन अब ये मुमकिन नहीं है। क्योंकि अपनी छलाँग लगाने कीक्षमता के बावजूद , मेंढक ने अपनीसारी ऊर्जा वातावरण के साथ खुद को Adjust करने में खर्च कर दी है।*

 

          *अब पानी से बाहर आने के लिए छलांग लगाने की शक्ति, उस में बची ही नहीं I वो पानी से बाहर नहीं आ पायेगा, और मारा जायेगा I*

 

          *मेढक क्यों मर जाएगा ?*

 

          *कौन मारता है* *उसको ?*

 

          *पानी का तापमान ?*

 

          *गरमी ?*

 

          *या उसके स्वभाव से ?*

 

          *मेढक को मार देती है, उसकी असमर्थता सही वक्त पर ही फैसला न लेने की अयोग्यता ।यह तय करने की उसकी अक्षमता कि कब पानी से बाहर आने के लिये छलांग लगा देनी है।*

 

          *इसी तरह हम भी अपने वातावरण और लोगो के साथ सामंजस्य बनाएरखने की तब तक कोशिश करते हैं, जब तक की छलांगलगा सकने कि हमारी सारी ताकत खत्म नहीं हो जाती।*

 

         *लोग हमारे तालमेल बनाए रखने की काबिलियत को कमजोरी समझ लेतेहैं। वो इसे हमारी आदत और स्वभाव समझते हैं। उन्हें ये भरोसा होता है कि वो कुछ भीकरें, हम तो Adjust कर ही लेंगे और वो तापमान बढ़ाते जाते हैं।*

 

            *हमारे सारे इंसानी रिश्ते, राजनीतिक और सामाजिक भी, ऐसे ही होते हैं, पानी, तापमान और मेंढकजैसे। ये तय हमे ही करना होता है कि हम जल के मरें या सही वक्त पर कूद निकलें।*जिसतरह से आज महंगाई बढ़ रही है,यदि हम ये सोचतेहैं कि बचत कर कर के ,हम आगे निकलजाएंगे तो हम पूर्णतः गलत हैं ।अभी समय रहते ,अपनी ऊर्जा को बचाते हुए हमें इनकम बढ़ाने के रास्तों परफोकस करना चाहिए ।

 

*(विचार करें, गलत-गलत होता है, सही-सही, गलत सहने कीसामंजस्यता हमारी मौलिकता को ख़त्म कर देती है)*


Posted on :6/1/2018 10:41:01 AM
   
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